स्वास्तिक (Swastik )

स्वास्तिक


होय स्वास्तिक जिस घर में,मंगल होवे द्वार।

विष्णु संग लक्ष्मी चली , आय आपके द्वार।।

आय आपके द्वार, सब भक्त खड़े कर-जोड़।

पधारो महाराज , आप लक्ष्मी यहीं छोड़।।

कह `वाणी´ कविराज, नाहीं कोई निर्धन रोय।

लेंगे सेठ उधार, जहाँ स्वस्ति वाचन होय।।



शब्दार्थ : पधारो = आने-जाने वाले के लिए सम्मानजनक शब्द, लक्ष्मी = धन की देवी


भावार्थ : फ्रंट इलेवेशन में उच्च स्थान पर बड़ा सा स्वास्तिक अति शुभ माना गया है। उसके अलौकिक आकष्Zाण से कभी लक्ष्मी को संग लिए विष्णु भी मॉनिZंग-वॉक करते हुए आपके द्वार तक चले आवेंगे। द्वार पर खडे़ प्रतिक्षा भक्तगण निवेदन करेंगे हे प्रभु! पधारो आपका स्वागत, लक्ष्मी जी का हादिZक स्वागत। हे दीन-दयाल ! हमारा विशेष निवेदन यह है कि आप अपनी प्राण-प्रिया लक्ष्मी को हमारे यहीं छोड़दें। भक्त वत्सल, वरदायी विष्णु के श्री मुख से भक्तों के लिए नहीं शब्द तो आज तक कभी निकला ही नहीं।

`वाणी´ कविराज कहते हैं कि ऐसी घटनाओं के पश्चात् कोई निर्धन नहीं रोवेगा बडे़-बडे़ सेठ उससे उधार लेवेंगे परन्तु यह कब संभव होगा जब उस भवन में नियमित स्वास्तिक अप भी होगा।





2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

स्वास्तिक के कई लाभ हे क्या आप हमें विस्तार से समजने का प्रयास करेंगे
b.k. sharma delhi

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी पोस्ट लिखी है।

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