मृदंगनुमा भवन (Mriranaganuma Building)

मृदंगनुमा भवन


मृदंगनुमा भवन जो, ढोलक जैसा होय।
बरतन बाजे ढोल से, ढोली ऐसा रोय ।।
ढोली ऐसा रोय, ढोलण परेशां होवे ।
डॅाक्टर आवे रोज, श्मशान अचानक जोवे ।।
कह ‘वाणी’ कविराज, बदलो यह जीवन ढ़ंग।
नई पत्नी आवे, तुम त्यागो यह मृदंग।।




शब्दार्थ: ढोली = भवन का मालिक, ढोलण = मालकिन, मृदंग = मृदंग जैसा भूखण्ड, जोवे = देखना



भावार्थ: मृदंगनुमा भवन दिखने में ढोलक जैसे होते हंै। वहँा प्रतिदिन भाँति-भाँति के विवाद होते रहते हैं, जिनमें रसोई के सारे बरतन ढोल की तरह बजने लगते हैं, ढोली को रोता हुआ देख ढोलण भी मन ही मन आँसू बहाती है। उस घर में बीमारी ऐसी निर्लज्ज मेहमान बन कर रहती है कि उसे भगाते-भगाते कई डाॅक्टर भाग जाते हैं पर बीमारी नहीं भगती और एक दिन अचानक ही बीमारियों के हेड क्वार्टर श्मसान घाट से अर्जेण्ट काल आ जाता है।

‘वाणी’ कविराज कहते हैं कि आपका जीवन अब भी पहले से श्रेष्ठ बन सकता है। एक सुन्दरी, पत्नी बन घर-गृहस्थी जमा देवेगी। तुम्हें तो बस इतना सा करना है कि या तो यह मृदंगनुमा भूखण्ड त्याग दो या इसे आयताकार में बदल दो।

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