है ! चारभुजा


है ! चारभुजा

चार भुजा असमान हो, शून्य होयगा मान।

धन भी छोड़े आपको, अंत होय अपमान।।

अंत होय अपमान, मन सदैव अशांत रहे।

दौड़-दौड़ के जाय, जंगल के एकांत में।।

कह ‘वाणी’ कविराज, ढूंढ़े सब अनुज अनुजा ।

जोड़े लंबे हाथ, मदद कर हे ! चारभुजा।।

शब्दार्थ: चार भुजा=प्लाट की चारों भुजा, चारभुजा = चतुर्भुज भगवान (विष्णु)

भावार्थ: जिस भूखण्ड की चारों भुजाएँ असमान हों वहाँ मान-सम्मान का ग्राफ घटता हुआ शुन्य से भी काफी नीचे तक चला आता है। धन जाता हुआ इतना अपमानित करा देता है कि जिससे भू स्वामी सदा अशांत रहता हुआ मात्र एक श्रेष्ठ मनोरोगी बन कर रह जाता है। वह भाग-भाग कर जंगलों के एकांत में जा-जा कर बैठता है।

‘वाणी’ कविराज कहते हैं कि देर रात तक भी गृहस्वामी घर नहीं पहुँचते, छोटे भाई-बहिन सब तरफ ढूँढ़ कर खाली हाथ घर लौट आते हैं । अंत में हाथ जोड़ प्रभु से ही प्रार्थना करते हैं कि हे चारभुजा नाथ ! अब आप ही मदद करो, जहाँ भी हो उन्हें ढूंढ़ कर घर लाओ।



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