शकटाकार जंमीं

शकटाकार जंमीं

शकटाकार जमीं जहाँ, जान जंग-मैदान।

बीमारी जाय न कभी , जाय धन और धान ।।

जाय धन और धान, क्रोध करते अग्नि-देव ।

करेगा देव-देव, सुने न कभी महादेव ।।

कह ‘वाणी’कविराज , जीवन भर रह बीमार ।

छोडूँ-छोडँू न कर , छोड़ जमीं शकटाकार ।।

शब्दार्थ: शकटाकार = बैलगाड़ी जैसी भूमि, जंग = लड़ाई-झगड़ा

भावार्थ: शकटाकार प्लाट को आप जंग का ओलंपिक मैदान समझ लो। कभी पड़ोसी वर्सेज पड़ोसी तो कभी लड़ाकू पत्नी वर्सेज सज्जन पति के बीच सेमी फाईनल मैच चलते ही रहते हैं। वहाँ से बीमारी तो जाती नहीं किंतु उसे भगाने के प्रयास में लक्ष्मी चली जाती है। अग्नि-भय सदैव बना रहता छोटे-मोटे देवी-देवता तो क्या महादेव भी मदद करने नहीं आतंे।

‘वाणी’ कविराज कहते हैं कि यह भूमि जीवन-भर बीमार रखने वाली त्याज्य भूमि है। तुम इसके लिए छोडँ़ू-छोड़ँू मत कहो आज से ही इसे छोड़ कर सदैव प्रसन्न रहो।

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