चमचा देय बनाय

चमचा देय बनाय


चमचा जैसी भू जहाँ, चमचा देय बनाय।
पंखाकार जिसे कहे, पंखे से धन जाय।।
पंखे से धन जाय, जाय दूधिया जानवर।
ना रहते पास पशु, कैसे पास रहते नर।।
कह ‘वाणी’ कविराज, सब गया कुछ नहीं बचा ।
देख जाने वाले, थाली कटोरी चमचा।।




शब्दार्थ
: चमचा = चम्मच/चापलूस व्यक्ति



भावार्थ: चमचे जैसी आकृति के भवन को चम्मच के भाव ही बेचते हुए उसे शीघ्र छोड़ देना चाहिए , वरना वह भवन आपको चमचा बना कर ही छोड़ेगा। इस आकृति का दूसरा नाम पंखाकार एवं व्यंजनाकार भी है। इसमें पंखे की तेज हवा से कागज के रंग-बिरंगे छोटे-छोटें टुकड़े उड़ जाते हैं। धन ही नहीं दूधिया जानवर भी एक-एक करके चले जाते हैं। जब जानवर ही पास नहीं रहते हैं, तो भला मनुष्य बाल-बच्चे वहाँ कैसे रहेंगे।

‘वाणी’ कविराज कहते हैं कि सुन गृहिणी बहुत कुछ चला गया कुछ नहीं बचा, देखती रहो अब शीघ्र ही तुम्हारें घर के थाली, कटोरी, चम्मच ये भी बिकने वाले हैं , इसलिए शीघ्र ही चमचाकार भवन को त्याग दो । यदि खाली भूखण्ड है तो इसके टुकड़े कर इसे आयत या वर्ग का आकार दे कर आप निर्माण कार्य करा सकते हंै।

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