धन-धन थानेदार (Money - money Inspector )

धन-धन थानेदार


चन्द्र सरीखा सदन हो, धन मुश्किल से आय ।
रहे न चार दिन वह तो, चोर-चोर ले जाय ।।
चोर-चोर ले जाय , ना आवे थानेदार ।
बहुत देर से आय , धन मांगे थानेदार ।।
कह ’वाणी’ कविराज, ना देखा उस सरीखा ।
धन-धन थानेदार ,जो सिंह चन्द्र सरीखा ।।



शब्दार्थ: सदन = भवन, चन्द्र सरीखा = चन्द्रमा जैसी वक्र आकृति का


भावार्थ: चन्द्राकार भवन में आय कम होती एवं चोरी-भय बढ़ता है। चोर चोरी करके सकुशल घर पहुँच जाने के बाद जब उनका राजी-खुशी का टेलिफोन थाने में पहँूच जाता है, तब अनुभवी थानेदार चोरों को पकड़ने घटना-स्थल पहुँचता है। वहाँ जाते ही थानेदार साहब भी पहले तो सांकेतिक भाषा में चाय-पानी की ही बात करतंे हैं।

’वाणी’ कविराज कहते हैं कि धन्य-धन्य हो थानेदार, मैने भी अभी तक वक्रता युक्त चतुर्थी के चन्द्र जैसा विचित्र थानेदार नहीं देखा।

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