Vastu Shastra: Khidki/ (SK-107)



खिड़की खिड़की ऐसी होय जो, ऊँची एक समान । समान दरवाजे रहे, दर-दर हो सम्मान ।। दर-दर हो सम्मान, आय के आएं साधन । बिना कमाया दौड़, आए करोड़ों का धन ।। कह ‘वाणी’ कविराज, रख अच्छे समय खिड़की। सुन्दर पड़ोसिन से, बातें करावे खिड़की।।
शब्दार्थ:

साधन = स्रोत
भावार्थ:

खिड़कियों की ऊँचाइयों में अंतर रख दिया तो यह हानिकारक सिद्ध होगा। दरवाजे भी इसी प्रकार समान ऊँचाई के होने चाहिए । दक्षिण दिशा के दरवाजे को धन-वृद्धि हेतु अन्य की तुलना में कुछ ज्यादा चैड़ा व कुछ ज्यादा ऊँचा रखना चाहिए । दरवाजों की समान ऊँचाई के कारणआयवसम्मान दोनों बढ़ते हैं,कभी-कभी तो बिना कमाया धन भी प्राप्त हो सकता है। ‘वाणी’ कविराज कहते हैं कि अच्छे मुहूर्त में रखी खिड़की से अन्य लाभों में तो देर हो सकती है, किन्तु सुन्दर पड़ोसिन सेतो तुरन्त बातें करवाती है।
वास्तुशास्त्री: अमृत लाल चंगेरिया 




Vastu Shastra: Mchli Jesi Prit/ (SK-106)




मछली जैसी प्रीत मछली जैसी प्रीत हो, जीव-जीव के मीत। जीवन-भर का साथ दे, लेय हृदय को जीत।। लेय हृदय को जीत, इधर काँटा उधर अश्रु । दिखावे प्रेम बहुत, नहीं दिखते प्रेम-अश्रु ।। कह ‘वाणी’ कविराज, टैंक की मछली ऐसी। प्रीत तुम्हें सिखाय, प्रीत कर मछली जैसी।।
शब्दार्थ:

प्रीत प्रेम, टेंक = पानी का कुण्ड
भावार्थ:

सच्चा प्रेम ही संसार का प्राण है। प्राणी मात्र एक दूसरे से पावन प्रेम व सच्ची श्रद्धा रखते हुए सभी के हृदय को जीत लेते हैं। इसी में जीवन की सार्थकता है । इधर काँटा चुभे और अश्रु धारा उधर बहे, यही प्रीत की पहचान है। आजकल हर कोई प्रेम में पागल दिखाई देता है, किंतु वियोग शृंगार की एक मात्र शाश्वत पूंजी अविरल अश्रुधारा, नेत्रों में कहीं दिखाई नहीं देती है। ‘वाणी’ कविराज कहते हैं कि वॉटर टैंक या जल भरे काँच के शो केस में मछलियाँ अवश्य रखें। आवासीय घरों में प्रेम प्रतीक यह मछलियाँजल को निर्मल रखती निवासियों के मन की मलिनताएँ दूर करती हुई सभी के स्नेहिल हृदय को पूर्णतः निष्कपट बनाने में सहयोग देंगी।
वास्तुशास्त्री: अमृत लाल चंगेरिया




Vastu Shastra: Bhagtram/ (SK-105)



भगतराम सौ-सौ के नोट रखते, मन में रखे न राम । पल-पल नया झूठ कहे, तो कहे भगतराम ।। तो कहे भगतराम, भरी तिजोरियाँ रोवे । रोय वह जीवन भर, नयन कभी नहीं सोवे ।। कह ‘वाणी’ कविराज, आप आपको न कोसो बुलालो वास्तुकार, नोट दो सौ के सौ-सौ ।।
शब्दार्थ:

भगतराम = राम का भगत, नयन = नेत्र, कोसो = आत्मग्लानि अनुभव करना
भावार्थ:

जिनके घरों में सौ-सौ के नोटों की तिजोरियाँ भरी होती हैं, वे मन में राम नहीं रख पाते हैं, दिन में सौ-सौझूठ बोलने पर भी लोग उन्हें भगतराम का ही दर्जा देते हैं। आधुनिक भगतराम कई प्रकार की मुसीबतों के कारण मनही मनरोते रहते हैं। जीवन में उन सजल नेत्रों को कभी आराम नहीं मिल पाता है।
‘वाणी’ कविराज कहते हैं कि आप अपने को न कोसें । किसी अनुभवी वास्तुकार को बुलवाकर, सौ नोट सौ सौ के,देकर भवन में सुधार करवालें जिससे धन के साथ-साथ कई प्रकार के अन्य सुख भी प्राप्त होएंगे।
वास्तुशास्त्री: अमृत लाल चंगेरिया 





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